छठीं शता दी ई.पू. में बौ धर्म का अयुदय भा रती य समा ज व संकृति में क्रां ति का थम शंखना द था । जब देश कुत्सि त पररा , घृणा , द्वेष, अशा न्ति , उमा द, हिं सा व वैमनयता के दौ र से गुजर रहा था , तब ही पृवी पर गौ तम बु एक महा मा नव के प में अवतरि त ए थे। जि नकी वि चा र धा रा ने भा रती य समा ज में क्रां ति का री परि वर्तनों का सूपा त कि या । कर्मका डी य ब्रा ण धर्म के वि ति पा दि त बौ धर्म वि -बंधुव व ‘सर्वजन हि ता य व सर्वजन सुखा य’ की भा वना उप्रेरि त था । मयदेश में बौ धर्म
पूर्ण वैभव के सा थ पलवि त आ जबकि गौ तम बु वयं कभी मयदेश में नहीं आए। प्रा ची न का ल से लेकर आधुनि क का ल तक बौ धर्म उत्था न और पतन की सभी अवस्था में लगा ता र संपूर्ण मय देश में वि मा न रहा । महा मा बु ने जि न सि द्धां तों एवं आदर्शों का ति पा दन कि या आज के आधुनि क समय में भी अपनी मा यता बना ए ए हैं। बौ धर्म को मय देश में रा जकी य संरण प्रा त आ जि सके फलवप मयदेश में वि भि वा तु एवं मूर्ति कला नि र्मि त ई और मय देश में बौ धर्म जो कि मा नवता वा दी धर्म से प्रेरि त था ने वि शेष उति की । मयदेश में रा यसेन जि ले के सां ची और सतना में भरत जैसे वि शा ल तूप का नि र्मा ण आ यह ना केवल बौ लों में अपि तु हिं धर्म लों में भी स्था पि त है। मंदसौ र, री वा , सतना , उज्जैन, रा यसेन, वि दि शा , वा लि यर आदि से जि ले हैं जो मय देश में बौ कें के प में उभर कर आए और रा जकी य संरण में वि तृत ए । बु के जी वन का ल में ही मय देश में बौ धर्म ने अपनी जड़े जमा ना शु कर चुका था । बौ धर्म का ज्ञा न हमें मगधी , पा ली , संकृत आदि भा षा में रचे गए सा हि त्यि क बौ ग्रंथों जैसे वि शेषतः वि नयपि टक, संयु नि का य, अगतुरनि का य, दी र्घनि का य, थेरगा था , दि व्या वदा न महा बो धी वंश नि का य महा वतु आदि से प्रा त हो ते हैं जो कि बौ धर्म का मय देश में उव, सा र तथा पतन के बा रे में पता चलता है सा थ ही उर बौ का ली न भि क्षु भि क्षुणि यों के नि वा स ल, तूप, महा वि हा र आदि के बा रे में सूचना प्रा त हो ती है।
